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12/24/2018

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

9/15/2015

The Road Not Taken

                                 BY ROBERT FROST

Two roads diverged in a  yellow wood,
And sorry I could not travel both
And be one traveler, long I stood
And looked down one as far as I could

To where it bent in the undergrowth;
Then took the other, as just as fair,
And having perhaps the better claim,
Because it was grassy and wanted wear;
Though as for that the passing there
Had worn them really about the same,

And both that morning equally lay
In leaves no step had trodden black.
Oh, I kept the first for another day!
Yet knowing how way leads on to way,
I doubted if I should ever come back.

I shall be telling this with a sigh
Somewhere ages and ages hence:
Two roads diverged in a wood, and I—
I took the one less traveled by,
And that has made all the difference.

3/07/2015

आग की भीख

                                                    by रामधारी सिंह 'दिनकर'
धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा, 
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा। 
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है; 
मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है? 
दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे, 
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे। 
प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ। 
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ। 

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है, 
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है? 
मँझधार है, भँवर है या पास है किनारा? 
यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा? 
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा, 
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा। 
तम-बेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ। 
ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ। 

3/06/2015

विजयी के सदृश जियो रे

                                                      By रामधारी सिंह "दिनकर"
वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो
चट्टानों की छाती से दूध निकालो
है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो
पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो
चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे
योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे!
जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है
चिनगी बन फूलों का पराग जलता है
सौन्दर्य बोध बन नयी आग जलता है
ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है 
अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे
गरजे कृशानु तब कंचन शुद्ध करो रे!
जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है
भामिनी वही तरुणी नर वही तरुण है
है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है
वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है
उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है
तलवार प्रेम से और तेज होती है!
छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाये
मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाये
दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है
मरता है जो एक ही बार मरता है
तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे
जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे!
स्वातंत्र्य जाति की लगन व्यक्ति की धुन है
बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है
वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे
जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे!
जब कभी अहम पर नियति चोट देती है
कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है
नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है
वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है
चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे
धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे!
उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है
सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है
विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिंतन है
जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन है
सबसे स्वतंत्र रस जो भी अनघ पियेगा
पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा! 

3/05/2015

नई आवाज

                                                                                    By रामधारी सिंह "दिनकर"
कभी की जा चुकीं नीचे यहाँ की वेदनाएँ, 
नए स्वर के लिए तू क्या गगन को छानता है ?

[1]
बताएँ भेद क्या तारे ? उन्हें कुछ ज्ञात भी हो, 
कहे क्या चाँद ? उसके पास कोई बात भी हो। 
निशानी तो घटा पर है, मगर, किसके चरण की ? 
यहाँ पर भी नहीं यह राज़ कोई जानता है।

[2]
सनातन है, अचल है, स्वर्ग चलता ही नहीं है;
तृषा की आग में पड़कर पिघलता ही नहीं है। 
मजे मालूम ही जिसको नहीं बेताबियों के, 
नई आवाज की दुनिया उसे क्यों मानता है ?

[3]
धुओं का देश है नादान ! यह छलना बड़ी है, 
नई अनुभूतियों की खान वह नीचे पड़ी है। 
मुसीबत से बिंधी जो जिन्दगी, रौशन हुई वह, 
किरण को ढूँढता लेकिन, नहीं पहचानता है।

[4]
गगन में तो नहीं बाकी, जरा कुछ है असल में, 
नए स्वर का भरा है कोष पर, अब तक अतल में। 
कढ़ेगी तोड़कर कारा अभी धारा सुधा की, 
शरासन को श्रवण तक तू नहीं क्यों तानता है ?

[5]
नया स्वर खोजनेवाले ! तलातल तोड़ता जा, 
कदम जिस पर पड़े तेरे, सतह वह छोड़ते जा; 
नई झंकार की दुनिया खत्म होती कहाँ पर ? 
वही कुछ जानता, सीमा नहीं जो मानता है।

[6]
वहाँ क्या है कि फव्वारे जहाँ से छूटते हैं, 
जरा-सी नम हुई मिट्टी कि अंकुर फूटते हैं ?
बरसता जो गगन से वह जमा होता मही में, 
उतरने को अतल में क्यों नहीं हठ ठानता है ?

[7] 
हृदय-जल में सिमट कर डूब, इसकी थाह तो ले, 
रसों के ताल में नीचे उतर अवगाह तो ले। 
सरोवर छोड़ कर तू बूँद पीने की खुशी में, 
गगन के फूल पर शायक वृथा संधानता है।