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9/04/2012

तुम्हारी प्रेम-वीणा का अछूता तार


                                रचनाकार: आरसी प्रसाद सिंह
तुम्हारी प्रेम-वीणा का अछूता तार मैं भी हूँ
मुझे क्यों भूलते वादक विकल झंकार मैं भी हूँ

मुझे क्या स्थान-जीवन देवता होगा न चरणों में
तुम्हारे द्वार पर विस्मृत पड़ा उपहार मैं भी हूँ

बनाया हाथ से जिसको किया बर्बाद पैरों से
विफल जग में घरौंदों का क्षणिक संसार मैं भी हूँ

खिला देता मुझे मारूत मिटा देतीं मुझे लहरें
जगत में खोजता व्याकूल किसी का प्यार मैं भी हूँ

कभी मधुमास बन जाओ हृदय के इन निकुंजों में
प्रतीक्षा में युगों से जल रही पतझाड़ मैं भी हूँ

सरस भुज बंध तरूवर का जिसे दुर्भाग्य से दुस्तर
विजन वन वल्लरी भूतल-पतित सुकुमार मैं भी हूँ

सैर सपाटा


                            रचनाकार: आरसी प्रसाद सिंह

कलकत्ते से दमदम आए
बाबू जी के हमदम आए
हम वर्षा में झमझम आए
बर्फी, पेड़े, चमचम लाए।

खाते पीते पहुँचे पटना
पूछो मत पटना की घटना
पथ पर गुब्बारे का फटना
तांगे से बेलाग उलटना।

पटना से हम पहुँचे राँची
राँची में मन मीरा नाची
सबने अपनी किस्मत जाँची
देश-देश की पोथी बाँची।

राँची से आए हम टाटा
सौ-सौ मन का लो काटा
मिला नहीं जब चावल आटा
भूल गए हम सैर सपाटा !

जीवन का झरना


                                     रचनाकार: आरसी प्रसाद सिंह

यह जीवन क्या है ? निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है ।
सुख-दुख के दोनों तीरों से चल रहा राह मनमानी है ।

कब फूटा गिरि के अंतर से ? किस अंचल से उतरा नीचे ?
किस घाटी से बह कर आया समतल में अपने को खींचे ?

निर्झर में गति है, जीवन है, वह आगे बढ़ता जाता है !
धुन एक सिर्फ़ है चलने की, अपनी मस्ती में गाता है ।

बाधा के रोड़ों से लड़ता, वन के पेड़ों से टकराता,
बढ़ता चट्टानों पर चढ़ता, चलता यौवन से मदमाता ।

लहरें उठती हैं, गिरती हैं; नाविक तट पर पछताता है ।
तब यौवन बढ़ता है आगे, निर्झर बढ़ता ही जाता है ।

निर्झर कहता है, बढ़े चलो ! देखो मत पीछे मुड़ कर !
यौवन कहता है, बढ़े चलो ! सोचो मत होगा क्या चल कर ?

चलना है, केवल चलना है ! जीवन चलता ही रहता है !
रुक जाना है मर जाना ही, निर्झर यह झड़ कर कहता है !

नए जीवन का गीत


                                 रचनाकार: आरसी प्रसाद सिंह 




मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
चकाचौंध से भरी चमक का जादू तड़ित-समान दे दिया।
मेरे नयन सहेंगे कैसे यह अमिताभा, ऐसी ज्वाला?
मरुमाया की यह मरीचिका? तुहिनपर्व की यह वरमाला?
हुई यामिनी शेष न मधु की, तूने नया विहान दे दिया।
मैंने एक किरण मांगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।

अपने मन के दर्पण में मैं किस सुन्दर का रूप निहारूँ?
नव-नव गीतों की यह रचना किसके इंगित पर बलिहारूँ?
मानस का मोती लेगी वह कौन अगोचर राजमराली?
किस वनमाली के चरणों में अर्पित होगी पूजा-थाली?
एक पुष्प के लोभी मधुकर को वसन्त-उद्यान दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
मलयानिल होता, तो मेरे प्राण सुमन-से फूले होते।
पल्लव-पल्लव की डालों पर हौले-हौले झूले होते।
एक चाँद होता, तो सारी रात चकोर बना रह जाता।
किन्तु, निबाहे कैसे कोई लाख-लाख तारों से नाता?
लघु प्रतिमा के एक पुजारी को अतुलित पाषाण दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।

ओ अनन्त करुणा के सागर, ओ निर्बन्ध मुक्ति के दानी।
तेरी अपराजिता शक्ति का हो न सकूँगा मैं अभिमानी।
कैसे घट में सिन्धु समाए? कैसे रज से मिले धराधर।
एक बूँद के प्यासे चातक के अधरों पर उमड़ा सागर।
देवालय की ज्योति बनाकर दीपक को निर्वाण दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
मुँहमांगा वर देकर तूने मेरा मंगल चाहा होगा।
शायद मैंने भी याचक बन अपना भाग्य सराहा होगा।
इसीलिए, तूने गुलाब को क्या काँटों की सेज सुलाया?
रत्नाकर के अन्तस्तल में दारुण बड़वानल सुलगाया?
अपनी अन्ध वन्दना को क्यों मेरा मर्मस्थान दे दिया?
मैंने एक किरण मांगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।

9/01/2012

इंसानियत का आत्मकथ्य

        रचनाकार: अनुपमा  पाठक                                                                                                                            
गुज़रती रही सदियाँ
बीतते रहे पल
आए
कितने ही दलदल
पर झेल सब कुछ
अब तक अड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

अट्टालिकाएँ करें अट्टहास
गर्वित उनका हर उच्छ्वास
अनजान इस बात से कि
नींव बन पड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

देख नहीं पाते तुम
दामन छुड़ा हो जाते हो गुम
पर मैं कैसे बिसार दूँ
इंसानियत की कड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

जब-जब हारा तुम्हारा विवेक
आए राह में रोड़े अनेक
तब-तब कोमल एहसास बन
परिस्थितियों से लड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

भूलते हो जब राह तुम
घेर लेते हैं जब सारे अवगुण
तब जो चोट कर होश में लाती है
वो मार्गदर्शिका छड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !

मैं नहीं खोई, खोया है तुमने वजूद
इंसान बनो इंसानियत हो तुममें मौज़ूद
फिर धरा पर ही स्वर्ग होगा
प्रभु-प्रदत्त नेमतों में, सबसे बड़ी हूँ मैं !
अटल खड़ी हूँ मैं !














आंसू चुनते किसी मोड़ पर मिलो कभी हमको

                  रचनाकार: अनुपमा पाठक                                                                             
भूलना हो
अगर अपना दर्द
तो अपनाओ
औरों के गम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!

रौशनी को
ढूंढना चाहते हो
तो समझो
घेरे हुए तम को!
आत्मा के प्रकाश से
उज्जवल होगा परिवेश
तोड़ो इस
प्रतिपल बढ़ते
अन्धकार के भ्रम को!!

ये क्या चल रहा है
उत्तरोत्तर
रोको इस
ह्रास के क्रम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!

कबतक ऐसे
निरर्थक कटेगा वक्त
सार्थक करें कुछ तो
इस मानव जन्म को!
इस काया से
काज हो पावन
मानें
सर्वोपरि
मानव धर्म को!!

चेतनाएं करवटें लेती हैं
शब्द अमर हो जाते हैं
गर एक बार वो तेज
हासिल हो जाये कलम को!
राह में तुम भी हो
राह में हम भी हैं
आंसू चुनते
किसी मोड़ पर
मिलो कभी हमको!!

सिपाही

                  
                   रचनाकार:    रामधारी सिंह "दिनकर"

                                                                                                             













































































































































































वनिता की ममता न हुई, सुत का न मुझे कुछ छोह हुआ,
ख्याति, सुयश, सम्मान, विभव का, त्यों ही, कभी न मोह हुआ।
जीवन की क्या चहल-पहल है, इसे न मैने पहचाना,
सेनापति के एक इशारे पर मिटना केवल जाना।

मसि की तो क्या बात? गली की ठिकरी मुझे भुलाती है,
जीते जी लड़ मरूं, मरे पर याद किसे फिर आती है?
इतिहासों में अमर रहूँ, है एसी मृत्यु नहीं मेरी,
विश्व छोड़ जब चला, भुलाते लगती फिर किसको देरी?

जग भूले पर मुझे एक, बस सेवा धर्म निभाना है,
जिसकी है यह देह उसी में इसे मिला मिट जाना है।
विजय-विटप को विकच देख जिस दिन तुम हृदय जुड़ाओगे,
फूलों में शोणित की लाली कभी समझ क्या पाओगे?

वह लाली हर प्रात क्षितिज पर आ कर तुम्हे जगायेगी,
सायंकाल नमन कर माँ को तिमिर बीच खो जायेगी।
देव करेंगे विनय किंतु, क्या स्वर्ग बीच रुक पाऊंगा?
किसी रात चुपके उल्का बन कूद भूमि पर आऊंगा।

तुम न जान पाओगे, पर, मैं रोज खिलूंगा इधर-उधर,
कभी फूल की पंखुड़ियाँ बन, कभी एक पत्ती बन कर।
अपनी राह चली जायेगी वीरों की सेना रण में,
रह जाऊंगा मौन वृंत पर, सोच न जाने क्या मन में!

तप्त वेग धमनी का बन कर कभी संग मैं हो लूंगा,
कभी चरण तल की मिट्टी में छिप कर जय जय बोलूंगा।
अगले युग की अनी कपिध्वज जिस दिन प्रलय मचाएगी,
मैं गरजूंगा ध्वजा-श्रंग पर, वह पहचान न पायेगी।

'न्यौछावर मैं एक फूल पर', जग की ऎसी रीत कहाँ?
एक पंक्ति मेरी सुधि में भी, सस्ते इतने गीत कहाँ?

कविते! देखो विजन विपिन में वन्य कुसुम का मुरझाना,
व्यर्थ न होगा इस समाधि पर दो आँसू कण बरसाना।